Wednesday, October 7, 2015

वो भी क्या दिन थे

वो भी क्या दिन थे
वो गांव जहां थी पीपल की छंाव
मिट्टी के घरोंदे और नीम की निबोली  
सितोलिया, लंगड़ी और लुका छिपी का खेल
दोस्तो के साथ बीते खट्टे मीठे पल थे
छोटी छोटी चीजों पर लड़ना झगड़ना था
और फिर मां की डांट से बचने के लिए बहाने करना था
सब कुछ रह गया है, जाने कहां
कहीं दूर धुंधला सा दिखता है
और देखते ही झलक आते हैं आंसू
क्योंकि अब नहीं लौट पाउंगी वहां
वो भी क्या दिन थे, जहां यह सब था और 'मैं"थी

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